6। दिलचस्प सवाल और खुलासा करने वाले जवाब

लिली का नज़रिया

माग्दालेना की बातों के बाद मैंने अपने बॉस को एक बिल्कुल अलग नज़र से देखना शुरू किया। साफ़ था कि उसने अपनी ज़िंदगी में बहुत कुछ झेला है। उसके लिए मेरे अंदर एक शांत‑सी ठान बन गई—उसे समझने की, उसका साथ देने की, किसी न किसी तरह उसे ढाल की तरह बचाने की। मुझे लोगों को तकलीफ़ में देखना अच्छा नहीं लगता था, ख़ासकर उसे।

वो अपने आप का बेहतर रूप बन पाए, इसके लिए मैं जो भी कर सकती, करती। अगर उसे मेरी ज़रूरत पड़ती, तो मैं वहीं होती। ये जिद उसके प्रति मेरी प्रशंसा से पैदा हुई थी या सिर्फ़ उसकी मौजूदगी मुझे अच्छी लगती थी, ये मैं नहीं जानती थी, लेकिन मैंने तय कर लिया था कि मैं उसके साथ खड़ी रहूँगी।

“लिली, तुम गैरेट को सनस्क्रीन लगा दोगी? नहीं लगाया तो वो जल जाएगा,” मिसेज़ माग्दालेना ने पूछा, जब हम किले के बाग़ में दोपहर की नरम हवा में चाय और चॉकलेट बिस्कुट के साथ आराम से बैठे थे। उनकी बात सुनकर मैं थोड़ा चौंक गई। ये कोई अजीब बात नहीं थी, फिर भी उसके इतना क़रीब जाने, उसकी त्वचा को छूने के ख़याल से ही मेरे अंदर हल्की‑सी सिहरन दौड़ गई… मेरा बॉस कुर्सी पर असहज‑सा हिला और बोतल की तरफ़ हाथ बढ़ाया।

“ज़रूरत नहीं, मैं खुद लगा लूँगा,” उसने कहा, लेकिन माग्दालेना ने बोतल वापस खींच ली और मेरी तरफ़ बढ़ा दी। उन्होंने आर्थर को मेरी गोद से उठाकर अपनी गोद में बिठा लिया। बच्चा चिड़चिड़ा‑सा हो रहा था, अपने दाँत निकलने वाले खिलौने को चबा रहा था।

“ऐसी कोई बात नहीं!” उन्होंने गैरेट को डाँटा। “तुम बचपन से ही बेकार रहे हो—क्रीम लगाना तो दूर, ठीक से कपड़े पहनना भी नहीं आता था तुम्हें। मुझे नहीं लगता तुममें कोई ख़ास सुधार हुआ है।” उनके आरोप भरे लहजे पर मुझे हँसी दबानी पड़ी। पूरे घर में वही एक थीं जो उसे इस तरह डाँट सकती थीं।

“ज़्यादा मत बढ़ाओ बात, मैग,” उसने पलटकर कहा, उनकी आँखों में देखते हुए। दोनों में गज़ब की समानता थी, जबकि खून का रिश्ता नहीं था। वो उसे सबसे ज़्यादा जानती थीं। उसने उसकी बात को नज़रअंदाज़ करते हुए आँखें घुमाईं और मेरी तरफ़ मुस्कुराईं। “तुम कर दोगी न, लिली बेटा?” उन्होंने प्यार से पूछा। मैं हल्की झिझक भरी मुस्कान के साथ उठ खड़ी हुई।

“जी, ज़रूर, मैडम।” मैं उसकी तरफ़ बढ़ी, जबकि वो मन ही मन बड़बड़ा रहा था। उसके सामने घुटनों के बल बैठकर मैंने उसकी काली फूलों वाली शर्ट के बटन खोलने से पहले उसकी आँखों में इजाज़त तलाश की, और फिर एक‑एक करके बटन खोलने लगी।

“अगर तुम्हें असहज लग रहा हो तो ज़बरदस्ती मत करो। मैं उतना निकम्मा नहीं जितना मैग कहती है,” उसने कहा। मैंने हल्की, दिलासा देने वाली मुस्कान दी।

“सच में, कोई दिक्कत नहीं है।” वो कुछ बुदबुदाया और चुप हो गया। अब मैं उसके इतना क़रीब थी कि उसकी साँसों की आवाज़ साफ़ सुन सकती थी। मैं इससे पहले भी उसके इतना पास आई थी—तहखाने में, जब उसने गुस्से में मुझे बंद करने की धमकी दी थी। अब, जब उसने मदद के लिए हाथ ऊपर उठाए, तो मैंने धीरे‑धीरे उसकी शर्ट उतार दी।

मेरी नज़रें अनायास ही उस पर दौड़ गईं—पतला, ज़्यादा भारी‑भरकम नहीं, लेकिन पेट पर उभरी हुई मांसपेशियाँ और साफ़‑साफ़ उकेरी हुई बाज़ू। एक सधा हुआ, खुरदुरा‑सा सौंदर्य। मैंने गला सूखता महसूस किया, उसकी तरफ़ देखते हुए जैसे ठहर ही गई।

“सब ठीक है? कोई दिक्कत तो नहीं?” उसकी धीमी, खिंची हुई आवाज़ ने मुझे चौंका दिया। उसकी गहरी नीली आँखों से नज़र मिलते ही मैं और ज़्यादा घबरा गई। मेरे शब्द लड़खड़ा गए।

“ओह, हाँ… सब ठीक है।” मैंने सनस्क्रीन उठाई, हथेलियों पर थोड़ा सा निकाला, दोनों हाथों में रगड़ा और फिर उसके बदन पर लगाना शुरू किया। मेरे छोटे हाथ उसके लंबे, प्रभावशाली शरीर पर बहुत संकोची‑से लग रहे थे, लेकिन मैं तल्लीन होकर काम करती रही, इस नज़दीकी से दिल ज़ोर‑ज़ोर से धड़क रहा था। मैंने इससे पहले कभी किसी को इस तरह क्रीम नहीं लगाई थी, और अगर कोई कह भी देता कि मैं इसमें माहिर हूँ, तो भी शायद मैं यक़ीन न करती—लेकिन उसके साथ, सब कुछ अलग‑सा लग रहा था।

“देखा, गैरेट? वो तुम्हारी कितनी अच्छी देखभाल करती है। इसका ख्याल रखना—ये किसी ख़ज़ाने से कम नहीं,” मैग्डालेना ने संतोष भरी मुस्कान के साथ कहा। अचानक उसने मेरी कलाई पकड़ ली, मेरी हरकत रुक गई। चौंककर मैंने ऊपर देखा, आँखों में उलझन थी।

“बकवास!” उसने मुझे धक्का दिया—ज़्यादा ज़ोर से नहीं, पर इतना कि मैं घास पर पीछे की तरफ़ गिर पड़ी और मुँह से एक हड़बड़ाया सा चीख जैसा निकला। वो उठ खड़ा हुआ, अपनी शर्ट उठाई, जल्दी से पहनी, मोबाइल उठाया और गुस्से में चल दिया। “अरे! कहाँ जा रहे हो, लड़के? आज तो परिवार के साथ दिन बिताने का है!” मैग्डालेना ने आवाज़ लगाई, पर वो बिना रुके चलता रहा।

“क्या मैंने उसे नाराज़ कर दिया?” मैंने हक्का-बक्का होकर पूछा। क्या मैंने उसे खरोंच दिया था? मेरे नाखून तो छोटे थे… मैग्डालेना ने हाथ हिलाकर बात टाल दी।

“तुम्हारी वजह से नहीं। वो खुद ही बहुत कड़वा हो चुका है।” मैं उसे जाते हुए देखती रही, सोचती रही क्या वो मुझसे नफ़रत करता है। जब आर्थर उसकी बाँहों में सिसकने लगा, तो मैंने हाथ पोंछे और उसे गोद में ले लिया, धीरे-धीरे उसे शांत करते हुए।

“आर्थर को ताज़ी हवा की ज़रूरत है। मैंने सोचा, हम कैथेड्रल के पास वाले सिटी पार्क में टहल सकते हैं। उसके लिए अच्छा है कि वो दूसरे बच्चों की आवाज़ें सुने,” कुछ दिन बाद मैं अपने बॉस के दफ़्तर के बाहर खड़ी होकर बोली। बगीचे वाली घटना के बाद से उसने मुझसे मुश्किल से ही बात की थी। मैंने मैग्डालेना की ये बात कि वो मुझसे नाराज़ नहीं, मन से निकाल दी थी—उसका यूँ चुप रहना मुझे गुस्से जैसा ही लगता था। ये पार्क जाने का बहाना मेरे लिए खुलकर बात करने का मौका था। उसने कलम रख दी और पूरा ध्यान मेरी तरफ़ कर लिया।

थोड़ी ही देर में हम तीनों पार्क में टहल रहे थे। दिन उजला और हल्की ठंडक वाला था, बच्चों की दौड़भाग से, बेंचों पर बैठे पढ़ते या बातें करते बड़ों से, कसरत करते लोगों से और इधर‑उधर भागते कुत्तों से पार्क भरा हुआ था। दूर, यॉर्क कैथेड्रल शान से खड़ा दिख रहा था। आर्थर अपनी स्ट्रॉलर में खुशी‑खुशी बड़बड़ा रहा था, जिसे मैं धकेल रही थी, और मेरे साथ‑साथ मेरे बॉस चल रहे थे। हम दोनों में से किसी ने अब तक कुछ नहीं कहा था। मैं हिम्मत जुटा रही थी।

“क्या आप मुझसे नाराज़ हैं?” मैंने अचानक पूछ लिया, इस आउटिंग को बेकार न जाने देने की बेचैनी में। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर आगे।

“मैं क्यों नाराज़ होऊँगा?” उसकी आवाज़ सपाट थी, बिना किसी भाव के।

“क्योंकि मैंने ज़्यादा हिम्मत दिखा दी, आप पर सनस्क्रीन लगाकर।” उसने नाक से हल्की सी आवाज़ निकाली—लगभग हँसी, मुझे लगा, जैसे उसे मज़ा आया हो।

“तुम हिम्मती हो, ये सच है, लेकिन तुम्हारे हाथ बहुत निपुण हैं।” मैंने सिर हिलाया, भीतर ही भीतर मुस्कुराई। ये तारीफ़ जैसी लगी। उसकी ऐसी दुर्लभ तारीफ़ें मेरा दिल हल्का कर देतीं, जैसे मैं हवा में उड़ रही हूँ। “तुम तो कोई मसाज पार्लर खोल सकती हो।”

“ओह, मेरी स्पेशलिटी तो बच्चे हैं,” मैंने छेड़ते हुए कहा।

“अगर तुम खोलो, तो मैं तुम्हारा कस्टमर बनूँगा।” मैं लगभग स्ट्रॉलर रोक ही देती, इतनी हैरान हो गई। वो मुझे अपने ऊपर मसाज करने देगा? “बस कहिए, मैं अभी कर दूँ!” ये मेरे होंठों तक आकर रुक गया, पर मैंने खुद को रोक लिया। उसकी जगह मैंने कहा, “शायद करूँगी, अगर आप मेरे सवालों के जवाब देंगे।”

“तुम्हारे पास सवाल हैं?” उसने पूछा।

“कुछ ख़ास नहीं। बस छोटी‑मोटी जिज्ञासाएँ।” मैं हँसी, उसे जानने की मेरी बेचैनी साफ़ झलक रही थी।

इन दिनों वो हर समय मेरे दिमाग़ में रहता था, सबसे अजीब पलों में भी अचानक याद आ जाता। मुझे उसके बारे में और जानने की भूख लगी रहती।

“मैं कम दखल देने वाले सवालों के जवाब दे दूँगा।” मैं हँसी और सवालों की झड़ी लगा दी।

“गर्मी या सर्दी? कॉफ़ी या चाय? पसंदीदा रंग? भीड़ या सुकून? आपको संगीत पसंद है? पसंदीदा गाना? पसंदीदा किताब?…”

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